Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
काकतालीयवच्चित्त्वाज्जगतो भाति ब्रह्म खम् ।
स्वप्नसंकल्पपुरवत्तत्तस्माद्भिद्यते कथम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
बतलाई गई रीति से यह जगत् भी चिद्रूप है, अतः ब्रह्माकाश
ही उस रूप से स्वप्ननगर या संकल्पनगर के सदृश अकस्मात् काकतालीय की नाई भासता
है वस्तुतः वह जगत् ब्रह्म से किस तरह अलग हो सकता है ? यदि ब्रह्म से अलग मान लिया
जाय, तो सत्ता का लाभ न होने से अलीक (अत्यन्त असत्) ही हो जायेगा