Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
ज्ञप्तिर्जगत्तया भाति संकल्पस्वप्नयोरिव ।
अनानावयवोदेति जलमूर्मितया यथा ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्प और स्वप्न के सदृश ही ज्ञप्ति
जगत् के रूप से भासती है । और वह यद्यपि अनेक अवयवोंवाली नहीं है, परन्तु जल ऊर्मियों के
रूप से जैसे अनेक अवयववाला भासता हे, वैसे ही अनेक अवयवोंवाली भासती हे