Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यद्यच्चेतयतेऽन्तस्तु जगदादीव पश्यति ।
अरूपमपि रूपं स्वं यन्न चेतयते न तत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे यह जीव अवयवरहित होता हुआ भी हाथ, पैर आदि अपने अवयवो की
कल्पना कर स्वप्नमनोरथ आदि में अवयववाला हो जाता है, वैसे ही सदा से अवयवशून्य, स्वभावतः
शान्त यह ब्रह्म ही जगद्रूप अवयव से अवयववाला बन जाता है