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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

संक्षुब्धमक्षुब्धमिति द्विरूपं संवित्स्वरूपं प्रवदन्ति सन्तः । श्रेयः परं येन समीहसे त्वं तदेकनिष्ठो भव माऽमतिर्भूः ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, शास्त्रज्ञ विद्वान्‌ संवित्‌ का एकरूप तो संक्षुब्ध यानी अज्ञानियों के अनुभव से सिद्ध विवर्तवाला है, यह कहते हैं और दूसरा अक्षुब्ध यानी विवर्तरहित कूटस्थ पूर्णानन्दैकरस है, यों कहते हैं । इन दोनों रूपों में आप अपना कल्याण जिससे चाहते हों, उसमें एकनिष्ठ हो जाइये । बिना परीक्षा किये किसी का ग्रहण कर अविवेकी मत बन जाइए