Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
मरुतः स्पन्दवैचित्र्यं सत्तयैव यथा तथा ।
ब्रह्मणो निःस्वभावस्य जगदाद्यहमादि च ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
अलगर सत्ता न होने से भी वह वही है, यह कहते हैं ।
जैसे पवन का स्पन्दवैचित्र्य पवनसत्ता के ही अधीन है, वैसे ही अविद्यारहित ब्रह्म के अहम् आदि
और जगत् आदि उसकी सत्ता के अधीन हैं