Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अहं ब्रह्म जगच्चेति शब्दसंभ्रमविभ्रमः ।
सर्वस्मिञ्छान्त आकाशे केन नामोपकल्पितः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में वह -अहम्“ आदि शब्दों का विषय ही नहीं है, यह कहते हैं /
श्रीरामजी, 'अहम्', ब्रह्म और जगत्" यह जो शब्दजालरूप भ्रम है, इसकी सर्वात्मक, शान्त
चिदाकाश में किसने कल्पना की ? यह बड़ा भारी आश्चर्य है