Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैवाहं जगच्चात्र कुतो नाशसमुद्भवौ ।
अतो हर्षविषादानां किंत्वेव कथमास्पदम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक््त क्चनो से जो निष्कर्ष निकला, उसे बतलाते हैं /
मैं और यह जगत् दोनों ब्रह्मरूप ही हैं, अत: इस दशा में जगत् की उत्पत्ति एवं नाश दोनों कहाँ
से ? इससे हर्ष और विषाद का स्थान ही क्या और किस तरह से ?