Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
यस्य चेच्छोदयस्तस्य सन्त्यवश्यं सुखादयः ।
ते चेत्सम्यक्चिकित्स्यन्ते पूर्वमिच्छैव मुच्यताम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जो इच्छावाला है, वह नित्य दु-खी है और न वह आत्मा ही है, किन्तु इच्छा त्यागर आदि उपायों
का अवलम्बनकर प्रतिकार करने योग्य सरस्राररूपी रोय की कोटि में प्रविष्ट कड दूसरा ही है, इस
आशय से कहते हैं ।
जिस प्राणी को इच्छा आदि विद्यमान हैं, उसीको सुख आदि अवश्य होते रहते हैं। यदि सुख
आदि रोगों की भलीभाँति चिकित्सा करना अभीष्ट है, तो सबसे पहले इच्छा का ही परित्याग कर
देना चाहिए