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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

अहं जगदिदं भ्रान्तिर्नास्त्येव परमे पदे । इदं शान्तमनालम्बं सर्वं निर्वाणमव्ययम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जो अविनाशी आत्मा हैं, उसमे उच्छा आदि का अभिमानी ओर अभिमान का विष्य जग्रत्‌ दोनों की सम्भावना नहीं करनी चाहिए, यह कहते हैं / अहंकार और यह जगत्‌ दोनों तरह की भ्रान्ति परम पद परमात्मा में है ही नहीं, यह तो शान्त, निरालम्बन (आश्रयरहित), सर्वात्मक विनाशशून्य मोक्षरूप ही है