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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 31

तीसवाँ सर्ग समाप्त डुकतीसवाँ सर्ग अचिद्रूप वस्तु असत्‌ हो या सत्‌, सभी चिति से ग्रस्त है, इसलिए कुछ भी नष्ट नहीं होता, इस विषय में निर्वाण की स्थिति का वर्णन।

38 verse-groups

  1. Verse 1नित्य निरतिशयानन्द से पूर्ण अग्राय विदाकाशरूप निर्वाणस्थिति का अनुभव कराने के लिए दृश्यान…
  2. Verse 2वही बाह्य पदार्थों के अनुभवरूप से दृढ़ अभ्यास होने के पहले बाहर में जगत्‌ के रूप से मानों…
  3. Verse 3ठीक हैं, ऐस़ा ही रहे, किन्तु इससे प्रक्रत में क्या आया 2 इस पर कहते हैं / यह सारा संसार च…
  4. Verse 4ऐसा ही रली, इससे भी प्रक्रत मे क्या आया 2 इस पर कहते हैं । न तो नाश है, न अस्तिता है, न अ…
  5. Verse 5जगत्‌ तथा अहंकार आदि के जड़ा का तत्वज्ञान द्वारा हआ नाश तो सभी को इृष्ट हैं ही, फिर उसका…
  6. Verse 6मिथ्या अवभासित हो रहे असत्‌ संकल्प नगर का नाश ही क्या (मिथ्या) है ? ठीक इसी तरह असद्रूप ज…
  7. Verse 7यदि यह जगत्‌ असद्रूप है, तो फिर अनर्थरूप से इसका वर्णन करके इसकी निन्दा तथा हेयरूप से इसक…
  8. Verse 8तब क्या वे शास्त्र सक व्यर्थ है 2 इस पर नही" यह कहते है/ स्वाभाविक स्वरूपस्थिति की सिद्धि…
  9. Verse 9ठीक हैं, आत्मतत्व के विषय में यह निर्णय एला ही रहे, किन्तु स्वर्गा आदि जयत्‌ के स्वरूप के…
  10. Verse 10चुषुप्ति और प्रलय में सर्ग तो अपने आप ही नष्ट हो जाते है, अतः उसमें ब्रह्मरूपता के परिज्ञ…
  11. Verse 11तब सृष्टि के रहते भल्रा प्रलय व्यवहार कैसे 2 इस पर कहते हैं / स्वप्नपुरुष के तुल्य जिन अस…
  12. Verse 12यही कारण है कि जीव और जयद्वपों के विषय में कोर्ड निर्णय न हो सकने से अनिर्ववनीयता कही गई…
  13. Verse 13इसीलिए तो तत््वज्ञानी पुरुष-स्रादा ही अद्वितीय चिदानन्द से परिपूर्ण रहते हैं यह कहते हैं…
  14. Verse 14आचारशून्य होते हुए भी आचारयुक्त स्वस्थ ही बने रहते हैं
  15. Verse 15तत्त्वज्ञानी पुरुष के हृदय के भीतर उदित हुई परिपूर्ण समुद्र के समान कोई अनिर्वचनीय ही पूर…
  16. Verse 16तब अज्ञपुरुष का स्वरूप क्या हे, इस पर कहते हैं / इस संसार में अज्ञानी पुरुष तो वासनारूप ह…
  17. Verse 17जिस पदार्थ की प्रतीति प्रकाश की अस्फूर्ति से सिद्ध है यानी प्रकाश के बिना जिस पदार्थ की प…
  18. Verse 18अकाश के बिना प्रतीत हो रहे पदार्थों की स्थिति किस तरह के प्रकाश में विमान नहीं रहती 2 इस…
  19. Verse 19ठीक हैं, ऐसा ही सही, परन्तु इससे प्रक्रत में क्या आया 2 इस पर कहते हैं / उस बुद्धि आदि घट…
  20. Verse 20ङस प्रकार आत्मप्रकाश के प्रछत होने पर कासना भी बाधित हो जाती हैं, इसलिए उस वासना से भी सं…
  21. Verse 21तत्वज्ञान होने पर बद्ध जीव की ही जक उपलब्धि नहीं होती, तब भला किसके द्वारा किसके बंधन की…
  22. Verse 22आत्मप्रकाश के मन्द पड़ जाने पर तो फिर चित्त का उदय हो जाने से संसार हो ही सकता हैं, इसलिए…
  23. Verse 23इसलिए हे श्रीरामजी, सबको छोड़कर आकाश के समान निर्मल आत्मा की ही एकमात्र आप उपासना कीजिये…
  24. Verse 24भूमिकाओं के अभ्यास में तत्पर युय॒ुक्ष किस तरह देखे, यह बतलाते हैं / न द्रष्टा है, न भोक्त…
  25. Verse 25यह सारा दृश्य जगत सद्रूप ब्रह्म ही है, ऐसा स्पष्ट ज्ञान हो जाने पर विम्ब और बिम्बी यानी च…
  26. Verse 26परमपद में विश्रान्त समदर्शी तत्त्वज्ञानी की समाधि या राग-द्रेष से शून्य व्यवहार दोनों ही…
  27. Verse 27अथवा निर्वाणरूप सप्तम भूमिका में प्राप्त इस ज्ञानी की शान्तरूपता ही अवशिष्ट रहती है, क्यो…
  28. Verse 28जब तक उस ज्ञानी की सप्तम भूमिका में विश्रान्ति परिपोषता को यानी दृढता को प्राप्त नहीं हो…
  29. Verse 29सप्तम भूमिका में प्राप्त ज्ञानी रागद्वेष भय और क्रोध से शून्य, निर्वाणरूप, शान्तमन पर पत्…
  30. Verse 30ङ्त तरह व्रह्म में स्वाभाविक भावना के अनुसार जयद्गप है तथा शाख्रीय तत्वभावना के अनुसार ता…
  31. Verse 31बाहर है“ यह प्रतीति आत्मा में बाह्यरूपता की भावना से ही है, न कि इसका दूसरा करई आधार होने…
  32. Verse 32यही कारण ह कि स्वप्न और जाग्रदवस्था प्रतीति से कोर्ड भेद नहीं है, यह कहते है/ जो अन्तःकरण…
  33. Verse 33जाग्रत और स्वप्नावस्था के पदार्थों में स्थिरता और चंचलतारूप भेद तो प्रत्यक्ष ही उपलब्ध हो…
  34. Verse 34जैसे स्वप्नकाल के पदार्थों में जब तक एकमात्र आत्मरृपता का अनुसन्धान नहीं होता, तभी तक उनक…
  35. Verse 35इसीलिए वास्तविक भी ब्रह्मभाव अपनी भावना के अधीन ही है, यह जो कहा गया हैं वह सिद्ध हो गया,…
  36. Verse 36स्वप्नादिज्ञान के शान्त होने पर जो विशुद्ध ईश्वर का रूप अवशिष्ट रहता है वह “अस्तिता' के न…
  37. Verse 37तब वाणी के द्वारा गरु लोग उसका उपदेश कैसे देते हैं; इस आशंका पर कहते हैं । भ्रम का आत्यन्…
  38. Verse 38इसलिए हे श्रीरामजी, अहंकार छोडकर भय, मान, विषाद, लोभ, मोह, आत्मा, देह, मन, इन्द्रिय, चित्…