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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

नाशे जगदहंत्वादेर्न किंचिदपि नश्यति । असतः किल नाशोऽपि स्वप्नादेः किं नु नश्यति ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत्‌ तथा अहंकार आदि के जड़ा का तत्वज्ञान द्वारा हआ नाश तो सभी को इृष्ट हैं ही, फिर उसका अपलाप कैसे किया जा सकता है 2 इस पर कहते हैं / इस जगत्‌ ओर अहन्ता आदि का नाश इष्ट होने पर भी वस्तुतः कुछ भी नहीं बिगड़ता, क्योकि असद्रूप स्वप्नादि का भी तो नाश इष्ट है, उससे क्या बिगड़ सकता है ? क्योकि नाश का स्वरूप ही क्या रहा ?