Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
वासनैवेह पुरुषः प्रेक्षिता सा न विद्यते ।
तां च न प्रेक्षते कश्चित्ततः संसार आगतः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
तब अज्ञपुरुष का स्वरूप क्या हे, इस पर कहते हैं /
इस संसार में अज्ञानी पुरुष तो वासनारूप ही है । तत्त्वदृष्टि से विचार कर देखने पर तो
वह वासना कुछ है ही नहीं । कोई भी विचार कर उसे देखता नहीं है और इसी से यह संसार
उपस्थित हुआ है