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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

यान्तः स्वप्नादिविभ्रान्तिः सैवेयं बाह्यतोदिता । मनागप्यन्यता नात्र द्विभाण्डपयसोरिव ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

यही कारण ह कि स्वप्न और जाग्रदवस्था प्रतीति से कोर्ड भेद नहीं है, यह कहते है/ जो अन्तःकरण में भीतर स्वप्न की विभ्रान्ति है वही यह बाह्य-जगद्रूप से उदित हुई है। दो पात्रों में स्थित दूध के समान स्वप्न तथा जाग्रदवस्था में तनिक भी भेद नहीं है