Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
शान्तं निरस्तभयमानविषादलोभमोहात्मदेहमननेन्द्रियचित्तजाड्यम् ।
त्यक्त्वाहमक्षयमपास्तसमस्तभेदं निर्वाणमेकमजमासितुमेव युक्तम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए हे श्रीरामजी, अहंकार छोडकर भय, मान, विषाद, लोभ, मोह, आत्मा, देह, मन, इन्द्रिय,
चित्त, जडता से शून्य, शान्त, समस्त भेदों से रहित अविनाशी, निर्वाणस्वरूप एकमात्र ब्रह्म होकर
सर्वदा ही समाधि में स्थित रहना ही युक्त है, व्यवहार विषयों में पड़ना उचित नहीं है