Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सर्वात्मनि चिदाभासे तदेवाश्वनुभूयते ।
संवेद्यते यदेवान्तरसत्यं वस्त्ववस्तु वा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
नित्य निरतिशयानन्द से पूर्ण अग्राय विदाकाशरूप निर्वाणस्थिति का अनुभव कराने के लिए
दृश्यानुभव द्ृश्यभावना के अभ्यास के अधीन है, इस्र पूर्वोक्त का स्मरण कराते हैं ।
महराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, अपने भीतर जिस किसी असद्रूप वस्तु या अवस्तु
की भावना की जाती है, तत्काल उसीका सर्वात्मक चिदाभास में अनुभव होने लग जाता है
सर्ग सन्दर्भ
तीसवाँ सर्ग समाप्त डुकतीसवाँ सर्ग अचिद्रूप वस्तु असत् हो या सत्, सभी चिति से ग्रस्त है, इसलिए कुछ भी नष्ट नहीं होता, इस विषय में निर्वाण की स्थिति का वर्णन।