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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

चिद्रूपं सर्वमेतच्च चिदच्छा गगनादपि । चिच्चिनोति चिदेवातो नैतत्किंचन कुत्रचित् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक हैं, ऐस़ा ही रहे, किन्तु इससे प्रक्रत में क्या आया 2 इस पर कहते हैं / यह सारा संसार चिति का ही रूप (कल्पित आकार) है । वह चिति आकाश से भी स्वच्छ है। चूँकि घृत जैसे अपनी आत्मा में ही काठिन्य को धारण करता है वैसे ही चिति जगत्‌-रूप आकार को धारण करती है, इसलिए यह सब चिद्रूप ही है । चिति से भिन्न ओर कुछ भी कहीं नहीं है