Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
स्वप्नादावात्मनोऽन्यत्वज्ञानादन्यत्ववेदनम् ।
अनन्यतावबोधे तु तदनन्यन्न चोदयि ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्नकाल के पदार्थों में जब तक एकमात्र आत्मरृपता का अनुसन्धान नहीं होता,
तभी तक उनका भान होता है / आत्ममात्रस्वरृपता का अनुसन्धान होने पर तो जायरणरूप
बोध से आत्मक्यता ही प्िद्ध होती हैं वैसे ही जाग्रदवस्था के पदार्थो में भी समझना चाहिए,
इस आशय से कहते हैं /
जैसे स्वप्नकाल के पदार्थों में आत्मा के अन्यत्वज्ञान से अन्यरूपता का भान होता है ।
आत्मैक्यता का अवबोध होने पर तो उससे अन्य कुछ भी नहीं भासित होता, वैसे ही
जाग्रदवस्था के पदार्थों में भी जब तक शुद्ध आत्मतत्त्व का ज्ञान नहीं होता तभी तक पदार्थों
में अन्यत्व भासता है । शुद्ध आत्मा का ज्ञान हो जाने पर तो वे सब के सब पृथक् आविर्भाववाले
ही नहीं होते एकरूप ही अवभासित होते हैं