Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
बाह्यताभावनाद्बाह्यमात्मैवात्मत्वभावनात् ।
भवतीदं परे तत्त्वे भावनं तत्तदेव हि ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
बाहर है“ यह प्रतीति आत्मा में बाह्यरूपता की भावना से ही है, न कि इसका दूसरा करई
आधार होने से यह कहते हैं /
आत्मा ही बाह्यरूपता की भावना से बाह्यरूप हो जाता है तथा आत्मतत्व की भावना करते
रहने से आत्मरूप ही रहता है, इसलिए परब्रह्मतत्त्व में ततू-तत् भावना ही बाह्यत्व और
आभ्यान्तरत्व है