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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

आत्यन्तिकभ्रान्तिलये युक्त एवावगच्छति । स्वरूपं नोपदेशस्य विषयो विदुषो हि तत् ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब वाणी के द्वारा गरु लोग उसका उपदेश कैसे देते हैं; इस आशंका पर कहते हैं । भ्रम का आत्यन्तिक लय हो जाने पर समाधि में स्थित योगी लोग ही अपने एकमात्र अनुभव से उसका स्वरूप जान पाते हैं । कान्तासम्भोगसुख की नाई, दूसरे के प्रति वह उपदेश का विषय नहीं है। वह विद्वानों के अनुभव का ही विषय है । उसमें श्रोता की बुद्धि को प्रवृत करना ही उपदेश का फल है