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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

भूतानि देहमांसादि तच्चासद्विभ्रमो जडः । बुद्ध्यहंकारचेतांसि तन्मयान्येव नेतरत् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

अकाश के बिना प्रतीत हो रहे पदार्थों की स्थिति किस तरह के प्रकाश में विमान नहीं रहती 2 इस पर वह कहते हैं । देह, मांस आदि स्थूल शरीर पंचीकृत भूतमय, असद्रिभ्रम से युक्त एवं जड़रूप है तथा मन, बुद्धि आदि सूक्ष्म शरीर भी पंचीकृत भूतों के विकारभूत ही हैं, अन्य नहीं