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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

कुतो जगदुपालम्भ इति चेत्तदवस्तुनि । न निर्णयः संभवति खपुष्पाणां किमुच्यते ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि यह जगत्‌ असद्रूप है, तो फिर अनर्थरूप से इसका वर्णन करके इसकी निन्दा तथा हेयरूप से इसका निर्णय शास्त्रों में क्यों किया जाता है ? यदि यह आप आशंका करें, तो यह आपकी आशंका एक तरह से ठीक ही है, क्योकि अवस्तुभूत पदार्थों के विषय मेँ न तो किसी प्रकार की निन्दा की ओर न उनके फल, विचार या किसी तरह के निर्णय की ही सम्भावना हे । किये, आकाश के फलों की कोई कभी निन्दा या उसके विषय में किसी तरह का निर्णय करता है ? बस, ठीक इसी तरह इसे भी जान लीजिये