Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
न नाशो नास्ति नानर्थो न जन्ममरणे न खम् ।
न शून्यता न नानास्ति सर्वं ब्रह्मैव नैव च ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसा ही रली, इससे भी प्रक्रत मे क्या आया 2 इस पर कहते हैं ।
न तो नाश है, न अस्तिता है, न अनर्थ है, न जन्म है, न मरण है, न आकाश है, न
शून्यता है और न अनेकता ही है, किन्तु अधिष्ठानरूप से सब कुछ एकमात्र ब्रह्म ही है, उससे
भिन्न और कुछ भी नहीं है