Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 28
सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त अड्डाईसवाँ सर्ग॑ बीजरूप और कार्यरूप तथा जन्म के हेतुभूत पुरुषकर्मो के, जो अद्ृष्टरूप निमित्त से सम्बद्ध है, स्वरूप का पुनः वर्णन।
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- Verse 1श्रीरामभद्र ने कहा : हे विभो, बीजरूप तथा कार्यरूप पुरुष के कर्मों का, जो जन्मरूप संसार अन…
- Verse 2सबसे पहले दव का तत्व कर्म हैं, कर्म का तत्व पुरुष है, पुरुष का तत्व मनोरूय चितिस्पन्दन है…
- Verse 3भद्र, संवित् के (चिति के) स्पन्दन के बिना पुरुष का रूप और कर्म कैसे हो सकता है ? संवित्…
- Verse 4यद्यपि सभी पदार्थ विति के स्पन्दनरूप ही हैं तथापि उनके वैचित्रय में और विनाश में कारण कहत…
- Verse 5महात्माओं का यह निश्चय है कि संवित्ति का (चितिका) स्पन्दन यदि वासनारहित है, तो वह अस्पन्द…
- Verse 6अतएव चिति का स्यन्दन ही पुरुष आदि आकाररूप हैं और वितिरमे स्यन्दन की ।निवृवत्ति ही निराकार…
- Verse 7भद्र, जैसे संकल्प से जनित जल ओर तरंग का भेद वास्तविक नहीं है, वैसे ही संकल्पजनित पुरुष और…
- Verse 8हे श्रीरामजी, कर्म ही पुरुष है और पुरुष में ही कर्मरूपता है, आप इन दोनों की हिम ओर शीतता…
- Verse 9भद्र, जो हिम है वही जैसे शीतता है ओर जो शीतता हे, वही जैसे हिम है, वैसे ही जो कर्म है वही…
- Verse 10एवं यह जो कटा गया था कि दैव. कर्म आदि एक ही वस्तु के भिन्न नाम हैं; यह प्रिद्ध हो गया, यह…
- Verse 11स्पन्दन के कारण ही संवित् जगत् की बीज हो जाती है ओर स्पन्दन के प्रभाव से अबीजरूप हो जात…
- Verse 12असीम चित्स्वभाव ही ऐसा है कि कहीं पर अपने स्वभाववश देश- काल क्रम में स्थित स्पन्दन से शून…
- Verse 13यद्यपि संवित् का स्पन्दन वास्तव में अकारण है, तथापि यहाँ वासना से युक्त होकर देह आदि अंक…
- Verse 14अवान्तर बीजों के रूप में स्थित वही संवित्-स्पन्दन सर्वत्र कारण हैं, उसी स्पन्दन की विशेष…
- Verse 15यदि बीज के अन्दर रहनेवाली शक्ति ही अकृर हैं, यों मानें; तो भी शक्ति और थक्तिमान् में क भ…
- Verse 16स्पन्दनशील हो रही चिति ही भूमि में वट आदि वृक्षों के अंकुर को स्थूल पदार्थ, सूक्ष्म पदार्…
- Verse 17चिति के बिना ऐसा कौन शक्तिमान् है, जो इस पृथ्वीतल से, अत्यन्त मृदु अंकुर से वज्र के सदृश…
- Verse 18यही न्याय रजवीर्य से शरीर सम्पादन में भी लगाना चाहिए. इस आशय से कहते हैं / जैसे लता में स…
- Verse 19श्रीरामजी, भला, बतलाइये तो सही कि यदि सर्वत्रस्थित यह संवित् अत्यन्त बलवती न होती तो, इन…
- Verse 20भद्र, स्थावर तथा जंगम पदार्थों का यही एक आदिम संवित्स्फुरण कारण है। और इसका कोई कारण नहीं…
- Verse 21बीज, अंकुर आदि विकल्पों का परस्पर; क्रिया, पुरुष एवं दैव का परस्पर तथा ऊर्मि, वीचि और तरग…
- Verse 22इस तरह के वेदलमत अभेद को जो पुरुष नहीं देखता, उसकी निन्दा करते हैं / भद्र, ऐसा होने पर भी…
- Verse 23वासना के सम्बन्ध से जनित संस्रारबीजता वासना के विनाश प्रे नष्ट हो जाती दहै यह कहते हैं। ज…
- Verse 24पण्डित लोग कहते हैं कि पुरुष कुछ करे चाहे कुछ भी न करे, परन्तु उसका शुभ-अशुभ कार्यों में…
- Verse 25यदि वासना ही चग है और वासना का उच्छेद ही असगर है, यह मानें; तो तत्वज्ञान के अभ्यास से ही…
- Verse 26वह युक्ति चाहे पहले कही गई राज-योगरूपा हो या हठयोगरूपा हो, परन्तु पुरुष प्रयत्न से दीर्घक…
- Verse 27समस्त कासनाओ का विद्प्रन्थिरूप अहंकार ही मूल है, अत: उसी का आय विनाश कीजिए, यह कहते हैं /…
- Verse 28वासनाक्षयनामक इस निरहंकाररूप संसारतरण में अपने पुरुषार्थ के सिवा दूसरी कोई गति है ही नहीं
- Verse 29अनादि अनन्त ग्रत्ययात्मरृप चैतन्य की सत्ता से ही बीज, अकृर आदि की स्ता हैं, स्वतः नहीं; य…
- Verse 30सबसे प्रथम न तो कोई चिति के सिवा दूसरा बीज है, न अंकुर है, न पुरुष है, न कर्म है और न दैव…
- Verse 31जब बीज आदि की स्वतः चत्ता स्थिर नहीं होती, तब यही निष्कर्ष निकलता है कि एकमात्र चिदात्मा…
- Verse 32हे अविकार श्री रामचन्द्रजी, उक्त प्रकार के निश्चय को अपने मन में स्थिर कर पुरुष, कर्म आदि…
- Verse 33इसीका स्पष्टीकरण करते हुए उपसहार करते हैं / हे रामभद्र, सब इच्छाओं से निर्मुक्त एवं अशेष…