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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

तृणवल्लीलतागुल्मबीजान्तरगतेरपि । बीजं संवित्स्पन्द एव तस्य बीजं न विद्यते ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

अवान्तर बीजों के रूप में स्थित वही संवित्‌-स्पन्दन सर्वत्र कारण हैं, उसी स्पन्दन की विशेष-विशेष कार्यो की व्यवस्था के लिए अवान्तर बीजों के रूपों में स्थिति हे इस आशय से कहते हैं । अन्यान्य अवान्तर तृण, वल्ली, लता, गुल्म आदि के बीजों की जो व्यवस्थित अंकुर आदि कार्य करने की प्रवृत्ति है, उसमें भी वही संवित्स्पन्द कारण है, उसका अन्य कोई बीज नहीं है