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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अवासनं हि संवित्तेः स्पन्दमस्पन्दनं विदुः । सस्पन्दोऽप्यस्फुरत्स्पन्दो येनावर्तादिनोह्यते ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

महात्माओं का यह निश्चय है कि संवित्ति का (चितिका) स्पन्दन यदि वासनारहित है, तो वह अस्पन्दन ही है। लोक में स्पन्दनशील भी तरंग आदि जब भवर आदि के द्वारा अपने अन्दर समाविष्ट कर लिये जाते हैं, तब उनमें स्पन्दन का परिज्ञान नहीं होता, फलतः उनकी अस्पन्दनशीलता ही तर्कित होती है