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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । दैवकर्मादिपर्यायं घटादि घटतावधि । संवित्स्पन्दनमेवेदं लोके पुरुषतां गतम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

सबसे पहले दव का तत्व कर्म हैं, कर्म का तत्व पुरुष है, पुरुष का तत्व मनोरूय चितिस्पन्दन है ओर चितिस्पन्दन का तत्व चिदात्मा है / यही विदात्मा प्राथमिक संकल्परूप वितिस्यन्दन से स्रमष्टि-व्यष्टि मनरूप बन जाता है, जिस्रका कि बहुस्यां प्रजायेय इस श्रुति मे उल्लेख है / इसके बाद लोक में देह्ाकार के अध्यास से (श्रम से) पुरुष हो जाता है / फिर कर्म करते-करते पुण्य - पापरुप अद्ृष्टात्मक दैवरूपता प्राप्तकर पण्य-पाप का रोग करने के लिए घट आदि रूप एवं घटावियत युणकियारुप से घटत्वादिसामान्यरूप बन जाता हैं, इसी से जयत्‌-रृप विवर्त में आ जाता है इन सब बातों से सार यह निकला कि दैव, कर्म आदि कारणशब्दरूप और घट से लेकर घटत्वधर्मपर्यन्त कार्यरप जो कुछ हैं, वह छव तत्त्वद्वाष्टि से वितिस्यन्द के की अलग-अलग नाम है; इस अभिप्राय को लेकर भगवान्‌ वस्तिष्ठजी कहते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, घट से लेकर घटत्वतक कार्यरूप और दैव, कर्म आदि कारणरूप जो कुछ भी है वह सब चिति का स्पन्दन ही है, और यही लोक में पुरुषरूप बन गया है