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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

नो बीजमस्ति न किलाङ्कुरकोऽपि वास्ति नाप्यस्ति कर्म पुरुषश्च न वास्ति साधो । एकं तु चित्त्वमुदितं ह्यनयाभिधानलक्ष्म्या नटः सुरनरासुरशोभयेव ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जब बीज आदि की स्वतः चत्ता स्थिर नहीं होती, तब यही निष्कर्ष निकलता है कि एकमात्र चिदात्मा ही असत्यश्रुत बीजादि के आकारें मे जगद्रूप बनकर विलास करता ह. यह कहते हैं । हे साधो, न तो कोई बीज है और न कोई अंकुर ही है । इसी तरह न तो कोई कर्म है और न कोई पुरुष ही है । जैसे नाटक का पात्र समय-समय पर देव, नर, दानव आदि नामों की शोभा धारण कर नृत्य करता हैं, वैसे ही एकमात्र चित्स्वभाव ही इन बीज, अंकुर आदि नामों की शोभा धारण कर विलास करता है