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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

प्रवर्तते जगल्लक्ष्मीः संवित्स्पन्दात्सवासनात् । निवर्तते हि संसारः संवित्स्पन्वादवासनात् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि सभी पदार्थ विति के स्पन्दनरूप ही हैं तथापि उनके वैचित्रय में और विनाश में कारण कहते हैं / सारे जगत्‌ की यह विचित्र शोभा वासनायुक्त संवित्‌ के स्पन्दन से उत्पन्न होती है और वासना से निर्मुक्त हुए संवित्‌ के स्पन्दन से निवृत्त होती है