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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 22

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस तरह के वेदलमत अभेद को जो पुरुष नहीं देखता, उसकी निन्दा करते हैं / भद्र, ऐसा होने पर भी पुरुष और कर्म में तथा बीज और अंकुर में जिस पुरुष को भेद वास्तविक भासता हो, उस महान्‌ पण्डितपशु को निरन्तर नमस्कार ही करना चाहिए