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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

आद्यैव संविदस्तीह सोऽङ्कुरो बीजमस्ति तत् । तत्कर्म तच्च पुरुषस्तद्दैवं तच्छुभाशुभम् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

अनादि अनन्त ग्रत्ययात्मरृप चैतन्य की सत्ता से ही बीज, अकृर आदि की स्ता हैं, स्वतः नहीं; यह कहते हैं । असल में यहाँ सबसे मुख्य तो संवित्‌ की ही एकमात्र सत्ता है, वही अंकुर है, वही बीज है, वही कर्म है, वही पुरुष है और वही पुण्य-पापरूप दैव है