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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

इत्येव निश्चयमनामय भावयित्वा त्यक्त्वा भृशं पुरुषकर्मविचारशङ्काम् । निर्वासनः सकलसंकलनाविमुक्तः संविद्वपुर्ननु यथाभिमतेच्छमास्व ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे अविकार श्री रामचन्द्रजी, उक्त प्रकार के निश्चय को अपने मन में स्थिर कर पुरुष, कर्म आदि मिथ्या विचार-जनित शंका का बिलकुल परित्याग कर वासनाशून्य, समस्त विकल्पों से रहित एवं चैतन्यमय बन जाइए । फिर आप अपनी अभिमत इच्छा के अनुसार समाधिस्थ होकर या व्यवहाररत होकर स्थित रहिए । इससे आपका कुछ भी बिगड़ेगा नहीं, यह सार है