Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
संवित्स्पन्दरसस्यैव दैवकर्मनरादयः ।
पर्यायशब्दा न पुनः पृथक्कर्मादयः स्थिताः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
एवं यह जो कटा गया था कि दैव. कर्म आदि एक ही वस्तु के भिन्न नाम हैं; यह प्रिद्ध हो गया,
यह कहते हैं /
दैव, कर्म, पुरुष आदि संवित् के स्पन्दनरूप रस के ही पर्यायवाची शब्द हैं, इसलिए
संवित्स्पन्दन से पृथक् कर्म आदि तनिक भी अपना पृथक् अस्तित्व नहीं रखते