Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
संवित्स्पन्दादृते पुंस्त्वं कर्म वा कीदृशं भवेत् ।
घटावटपटाद्यात्म ह्येतेनैव जगत् कृतम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, संवित् के (चिति के) स्पन्दन के बिना पुरुष का रूप और कर्म कैसे हो
सकता है ? संवित् का स्पन्दन ही घट, पट, वट आदि का स्वरूप है। इसी ने समस्त जगत्
को उत्पन्न किया है ? यही कारण है कि पुरुष के कर्म आदि और घट-पटादि के अस्तित्व
या परिज्ञान आदि चिति के अस्तित्व और प्रकाश के ही बदौलत होते हैं, यह सभी को विदित
है । यदि इन सबको संवित् का यानी चिति का विवर्तं न माना जाय, तो न उनका अस्तित्व
मालूम पड़ सकता है और न उनका प्रकाश ही हो सकता है, ऐसी स्थिति में उनका स्वरूप
कैसा होगा ? अर्थात् असत् ही होगा, यह भाव है