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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 45

चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतालीसवाँ सर्ग स्व-स्वरूप आनन्दात्मक रस से परिपूर्ण, तीनों लोकों की कल्पना के आश्रय परब्रह्म का बिल्वफलरूप से वर्णन |

32 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, तत्त्वज्ञान के लिए इस विषय मेँ आप आश्चर्य ओर उल्ला…
  2. Verse 2श्रीरामजी, हजारों योजन विस्तृत विमल स्पष्ट एक बहुत बड़ा विल्वफल है, जिसका स्वरूप युगो से…
  3. Verse 3वह बिल्वफल अविनाशी रसका आश्रय है, उसका सार अमृत की तरह अथवा अमृत से भी बढ़कर मधुर है, वह…
  4. Verse 4वह भुवन-समूहों के मध्य में स्थित मेरुपर्वत की नाई प्रधान स्तम्भ है, मन्दराचल की नाई दृढ़…
  5. Verse 5पूर्वोक्त योजनानां सहस्राणि“ इस मे कहे गये सहस्नपद का 'असंख्य' अर्थ में व्याख्यान करते है…
  6. Verse 6भद्र, वह ऐसा बिल्वफल हे कि जिसके समीप में उन्नत सभी ब्रह्माण्ड ऐसी शोभा धारण करते हैं, जे…
  7. Verse 7हे राघव, इस विल्वफल से चू रहे रस से परिपूर्ण अत्यंत स्वादयुक्त रस चमत्कार का कोई भी षड्‌-…
  8. Verse 8वैसे रस से परिपूर्ण होने पर भी पाक से वह कभी गिरता नहीं । (तव क्या वह अपने स्थान में ही ज…
  9. Verse 9ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, रुद्र आदि कोई भी चिरंजीवी लोग इस विल्वफल की उत्पत्ति को नहीं जान…
  10. Verses 10–11जिसका अंकुर और वृक्ष नहीं देखा गया है, जिसके फूलों का आकार भी नहीं देखा गया हे, स्तम्भ, म…
  11. Verse 12समस्त फलों एवं पुरुषार्थो मे श्रेष्ठ, महान्‌ आकारवाले इस फल में न गुदा हे ओर न गुठली ही ह…
  12. Verse 13वह शिला के भीतरी प्रदेश की नाई छिद्ररहित यानी घनीभूत (७) है और अमृत का स्राव कर रहे चन्द्…
  13. Verse 14यह बिल्वफल सम्पूर्णं सुखो का मानों एक निधि हे, शीतल प्रकाश देनेवाला है, पर्वत के समान शोभ…
  14. Verse 15हिरण्यगर्भ के आनन्द से भी बढ़कर जो आत्मा की चमत्कृति है, वही इस परम अव्यक्त की मज्जा है य…
  15. Verses 16–17अनन्यत्व का (अद्भयता का) ही उपपादन करने के लिए चमत्कृतिपद का स्वारस्य प्रकट करते हैं। (चू…
  16. Verse 18(७) इस विषय में “विज्ञानघन एव” यह श्रुति प्रमाणतया उद्धृत की जा सकती है । (८) इस विषय में…
  17. Verse 19अपने स्वरूप के त्याग के बिना उस प्रकार के स्वरूपो की प्राप्ति कर लेना ही इस चिति की बहुत…
  18. Verse 20श्रीरामजी, व्यवहार समर्थ स्वरूपता प्राप्त करने के अनन्तर चंचल स्वरूपवाली उस चितिशक्ति ने…
  19. Verse 21ऐसी स्थिति मे आकाश आदि सभी कुछ चितिशक्तिस्वरूप ही है, इसे छोड़ दूसरा कुछ भी नहीं है यों ज…
  20. Verse 22इसी प्रकार आध्यात्मिक विषय भी यह है, यह कहते हैं। यही (७) (चितिशक्तिस्वरूप ब्रह्म) संकल्प…
  21. Verse 23यही चितिशक्ति त्वत्ता यानी त्वद्रूप है, यही 'मत्ता' यानी अहंरूप है ओर यही स्वयं "तत्ता" र…
  22. Verse 24यही चितिशक्तिस्वरूप आत्मा आगे हे, यही दोनों ओर यानी दायें - वाये, पीठे, समीप और दूरतर है…
  23. Verse 25इसी ब्रह्य मेँ कल्पनारूपी कमलों के आश्रय अनन्त जीव भीतर अवस्थित हैं, यही ब्रह्माण्ड-मण्डप…
  24. Verse 26यही चितिशक्ति अनन्त रचनाओं के रहस्यों से चारों ओर पल्लवित नारायण का हृदय-कमल ओर लोकरूपी क…
  25. Verse 27इस चितिशक्ति के कोटर चारों ओर व्याप्त महारुद्र के गणों से भरे हैं, यही लम्बी आकाशरूपा सरण…
  26. Verse 28यही इस उत्तर दिशा में स्थित मेरुपर्वत है ओर जगत्‌-रूपी कमल का वह छत्ता है, जहाँ स्फुरित ह…
  27. Verse 29रजोगुण के कार्य राग आदि से एवं नरकों से यानी दुःखों से जिसका मूल (जड) बना है, ऐसे जगद्रूप…
  28. Verse 30ओर यही चितिशक्ति तारा-गणरूप केसरो से (&) चितिशक्ति के वर्णन -प्रसंग में उसके विशेषणो में…
  29. Verses 31–33जिसमें चारों ओर कर्मस्वरूप ही मगर विद्यमान हैं; तरगों की नाई चंचल, मास, ऋतु आदि की पँक्ति…
  30. Verse 34ये जो भाव-विकारों से परिपूर्णं जरा-मरणरूपी विषूचिकाएँ (महामारियाँ) हैं, वे सब यह चितिशक्त…
  31. Verse 35सर्वोपद्रवों से वर्जित, अपने स्वरूप में स्थित, सर्वविध पीड़ाओं से शून्य, सौम्य तथा कल्पना…
  32. Verse 36बिल्वाख्यायिका की समाप्ति कर अब चिति का स्वरूपतः वर्णन कर रहे महाराज वस्निष्ठजी उपसंहार क…