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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

एषैकिकैव विविधेव विभाव्यमाना नैकात्मिका न विविधा ननु सैव सैव । सत्यास्थिता सकलशान्तिसमैकरूपा सर्वात्मिकातिमहती चितिरूपशक्तिः ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

बिल्वाख्यायिका की समाप्ति कर अब चिति का स्वरूपतः वर्णन कर रहे महाराज वस्निष्ठजी उपसंहार करते हैं। वास्तव में एकस्वरूप (अद्वितीयस्वरूप) भी यह चितिशक्ति अज्ञानियों द्वारा नाना प्रकारकी-सी (सद्वितीय-सी) कल्पित की जा रही है। (एकत्व संख्या भी द्वित्व-संख्या की जननी होने से) वह न एकात्मिका है और न विविध ही है, किंतु वह (चितिशक्ति) एकत्वरूप है ओर एकत्व भी तत्स्वरूप ही है । अथवा सजातीय एवं विजातीय से रहित है। वह सत्यस्वरूप होकर अवस्थित है, द्वैत-विकल्पों की शांति हो जाने से सम, एकरूप ओर सर्वात्मिका है। हे श्रीरामजी, मैंने आपसे अत्यन्त महान्‌ ब्रह्मशब्द से लक्षित होनेवाली चितिशक्ति का इस प्रकार वर्णन किया