Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
शान्ता स्वस्था निराबाधा सौम्या भावनयोज्झिता ।
कर्तृत्वमप्यकर्तृत्वं कृत्वाऽकृत्वेव संस्थिता ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वोपद्रवों से वर्जित, अपने स्वरूप में स्थित, सर्वविध पीड़ाओं से शून्य, सौम्य
तथा कल्पनाओं से रहित यह चितिशक्ति वास्तव में पदार्थों की रचना न करने के कारण कृतिशून्य
होती हुई भी मानों पदार्थ रचना कर कृतियुक्त-सी होकर अवस्थित है