Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अविनाशरसाधारं सुधामधुरसारवत् ।
पुराणमपि बालेन्दुदलमार्दवसुन्दरम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वह बिल्वफल अविनाशी रसका आश्रय है, उसका सार अमृत की तरह अथवा
अमृत से भी बढ़कर मधुर है, वह पुराना होने पर भी बालचन्द्र की प्रतिदिन बढनेवाली कलाओं की
नाई मृदुलता से त्वचा ओर नेत्रं को सुखकर स्पर्श देने के कारण सुन्दर है