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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

योजनायुतकोटीनां कोटिलक्षशतैरपि । वैपुल्येनापरिच्छेद्यं मूलमाद्यं जगत्स्थितेः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त योजनानां सहस्राणि“ इस मे कहे गये सहस्नपद का 'असंख्य' अर्थ में व्याख्यान करते है । सैकड़ों कोटि लक्ष गुने दस हजार करोड़ योजनो के विस्तार से भी अर्थात्‌ असंख्यात योजनां के विस्तार से भी नापा नहीं जा सकनेवाला वही बिल्वफल इस जगत्‌ के धारण एवं नियमन का आद्य मूल है