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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

अहंकलासमुदयसमनन्तरमेव सा । वलिताकाशशब्दाङ्गत्रैलोक्यपरमाणुभिः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

(७) इस विषय में “विज्ञानघन एव” यह श्रुति प्रमाणतया उद्धृत की जा सकती है । (८) इस विषय में “एतस्यैवानन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति" यह श्रुति प्रमाण है । (५) यदि देह ही असत्‌ है, तो उसकी उत्पत्ति कैसे होती है इस शंका पर “इयमस्मि यह कहा गया है । एवंच इदन्ताशून्य में इदन्ता का अध्यास ही भेदोत्पत्ति का प्रयोजक है, यह भाव है । (70) 'असंभवत्‌” इससे यह द्योतित किया गया है कि स्वयं प्रकाश एवं एकमात्र चैतन्यरसात्मक आत्मचमत्कृति में यदि मल यानी अविद्या का ही संभव नहीं है, तो सुतरां उस अविद्या के कार्यभेद का (पृथक्त्व का) भी संभव नहीं है । वही आत्मचमत्कृति स्वोत्पादित भूत, भुवन आदि भेदो से अहन्ता के उत्पादन द्वारा आभिमानिक संवलन प्राप्त करती है, यह कहते है । व्यष्टि-समष्टिरूप से अहंकार की उत्पत्ति होने के अनन्तर ही वह आत्मचमत्कृति आकाश और आकाश के गुण शब्दरूपी अंगों से युक्त समष्टिरूप शरीरों के परमाणुओं से संयुक्त हो जाती है