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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verses 31–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verses 31–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

इयं क्रियापरिग्राहा तरङ्गतरलावली । सर्गावर्तविधानस्थभूरिभूतपरम्परा ॥ ३१ ॥ इयत्तया प्रसरिणी क्षणकल्पादिपल्लवा । तेजःकेसरिणी कालनलिनी व्योमपङ्कजा ॥ ३२ ॥ इमा भावविकाराढ्या जरामृतिविषूचिकाः । विद्याविद्याविलासाढ्या इमाः शास्त्रार्थदृष्टयः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसमें चारों ओर कर्मस्वरूप ही मगर विद्यमान हैं; तरगों की नाई चंचल, मास, ऋतु आदि की पँक्तियाँ जिसमे हैं; प्रजोत्पादनरूप भँवरों के कार्यों में स्थित भूत-परम्पराओं से जो युक्त है; प्राणियों के आयुःपरिमाण से विस्तृत; क्षण, कल्प आदि पल्लवो से युक्त; तेज से यानी अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदि से केसरोवाली ओर आकाशरूप कमलो से समन्वित कालरूपी नलिनी (सरोवर) यही चितिशक्ति है