Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verses 10–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
अदृष्टाङ्कुरवृक्षस्य त्वदृष्टकुसुमाकृतेः ।
अस्तम्भमूलशाखस्य फलस्यास्य महाकृतेः ॥ १० ॥
एकपिण्डघनाकारविततस्थौल्यशालिनः ।
यस्योत्पत्तिविकारादिपरिणामो न दृश्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका अंकुर और वृक्ष
नहीं देखा गया है, जिसके फूलों का आकार भी नहीं देखा गया हे, स्तम्भ, मूल ओर शाखा से रहित,
महान् आकारवाले तथा एकमात्र पिण्डीभूत चिद्घनाकार अत्यंत विस्तृत स्वभाव इस फल की उत्पत्ति,
विकार, परिणाम आदि कभी भी नहीं दिखाई पडते