Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
तस्मात्परममज्जा तु यासौ स्वात्मचमत्कृतिः ।
अनन्तरक्षितो नित्यमनन्यः श्रीफलं गतः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
हिरण्यगर्भ के आनन्द से भी बढ़कर जो आत्मा की
चमत्कृति है, वही इस परम अव्यक्त की मज्जा है यानी सारभूत वस्तु है; देश, काल और वस्तु से
जनित त्रिविध परिच्छेदं से शून्य स्वभाव से उसकी रक्षा हुई हे । वास्तव में स्व -स्वरूप आत्मा ही इस
बिल्वफलरूपता को प्राप्त हुआ है, अतः वह अद्वितीय ही है