Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
इयं च ताराकिंजल्का ब्रह्मार्णवतटस्थिता ।
अपारापारपर्यन्ता व्योमलीलासरोजिनी ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
ओर यही चितिशक्ति तारा-गणरूप केसरो से
(&) चितिशक्ति के वर्णन -प्रसंग में उसके विशेषणो में जो लिंगभेद (पुलिंग एवं नपुंसकलिंग) जहाँ-तहाँ
किया गया है; उसकी आत्मा, ब्रह्म आदि विशेष्य पदों का अध्याहार कर उपपत्ति कर लेनी चाहिए ।
समन्वित, ब्रह्माण्डरूपी समुद्र के तीर पर स्थित, ऊपर और चारों ओर अपार सीमावाली मानों व्योमाकार
कमलिनी अथवा सरोवर ही हे