Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अत्रेमामवबोधाय विस्मयोल्लासकारिणीम् ।
अपूर्वां चैव संक्षेपाद्राम रम्यां कथां श्रृणु ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, तत्त्वज्ञान के लिए इस विषय मेँ आप आश्चर्य ओर
उल्लास की जनक, अपूर्व, रम्य यह विल्वोपाख्यायिका संक्षेप से सुनिए
सर्ग सन्दर्भ
चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतालीसवाँ सर्ग स्व-स्वरूप आनन्दात्मक रस से परिपूर्ण, तीनों लोकों की कल्पना के आश्रय परब्रह्म का बिल्वफलरूप से वर्णन |