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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

इति सा तस्य बिल्वस्य निजमज्जाचमत्कृतिः । संकल्पसंनिवेशान्तरेवैव कृतसंस्थितिः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

ये जो भाव-विकारों से परिपूर्णं जरा-मरणरूपी विषूचिकाएँ (महामारियाँ) हैं, वे सब यह चितिशक्ति ही है । ओर विद्या एवं अविद्या के विलास से पूर्ण जो ये शास्त्रीयविषयों की दृष्टियाँ हैं, वे सब भी यही चितिशक्ति है ॥३ ३॥ श्रीरामजी, अभी तक वर्णित सभी प्रकार उस बिल्वफल के स्वकीय सार की चमत्कृति ही है अर्थात्‌ वे सब प्रकार आत्मचमत्कृति स्वरूप ही हैं। और उसीने ऊपर कहे गये प्रकारों से व्यष्टि एवं समष्टि के संकल्प-सन्निवेश के भीतर ही अपनी स्थिति की है