Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
इत्यनुक्रमतो याता संविच्छक्तिस्वरूपताम् ।
मज्जा प्राक् संनिवेशं स्वं तमेवाप्य समुज्झती ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने स्वरूप के त्याग के बिना उस प्रकार के स्वरूपो की प्राप्ति कर लेना ही इस चिति की बहुत
बड़ी आत्मचमत्कृति है । इसीका मैने पूर्वोक्त रीति से वर्णन किया है, यों उपसंहार करते है ।
श्रीरामजी, अपने पहले के चैतन्यात्मक सारस्वरूप संनिवेश को (रचना को) न त्यागती हुई यह
चिति इस प्रकार क्रमशः व्यवहार में समर्थ स्वरूपता को प्राप्त कर लेती हे