Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 21
बीसवाँ सर्ग समाप्त इक्कीस सर्ग॑ कल्पवृक्ष का माहात्म्य, प्रलय में वारुणी आदि धारणाओं द्वारा अपनी स्थिति, ईश्वरीय नियमिका शक्ति और अनेक चित्र-विचित्र अर्थो के स्मरण का वर्णन |
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- Verse 1अपने आश्रय कल्पवृक्ष के माहात्म्य वर्णनप्रसंग मेँ युगविनाश काल में जनित उपद्रवो से अपने क…
- Verse 2हे साधो, अन्य लोकों में विहार करनेवाले सभी प्राणियों का यह अत्यन्त अगम्य स्थान है, अतः यह…
- Verse 3वेगपूर्वक अपहरण किया था, उस समय पृथ्वी पर स्थित होने के कारण इसके भी हरण, कम्पन आदि की सं…
- Verse 4(वराह भगवान द्वारा किये गये पृथ्वी के उद्धार के समय) खम्भ की आधारभूत शिला की नाई चारों ओर…
- Verse 5दो भुजाओं के अवष्टम्भ (पकड) से मेरु को दबाकर जब चतुर्भुज भगवान नारायण ने इतर दो हाथों द्व…
- Verse 6जब देवासुर संग्राम के कारण चन्द्र-मण्डल और सूर्य-मण्डल गिर गया था तथा जगत में अत्यन्त क्ष…
- Verse 7जब पर्वतराज की शिलाओं का उन्मूलन कर देनेवाले ओर मेरुपर्वत के अन्यान्य वृक्षों को कम्पित क…
- Verse 8क्षीर-सागर में चंचल हुए मन्दराचल की गुहाओं के वायुओं से मानों कम्पित हुई कल्पान्त की मेघप…
- Verse 9जब (तारकासुर युद्ध में) कालनेमि की भुजाओं में मेरु पर्वत चारों ओर से उन्मूलित होकर अवस्थि…
- Verse 10जिनके कारण बड़े-बड़े सिद्ध गिर रहे थे, ऐसे पक्षिराज गरुड (५) के पंखों के पवन जब अमृत हरण…
- Verse 11आज भी जिसकी पृथ्वी धारणरूप चेष्टा समाप्त नहीं हुई है, ऐसी शेषाकृति को संकर्षण रुद्र जब प्…
- Verse 12प्रलयकाल में जब शेष ने फणाओं से, शेल, सागर एवं समस्त प्राणियों से सही न जानेवाली प्रलयाग्…
- Verse 13हे मुनियों में सिंहरूप महाराज वसिष्ठजी, इस प्रकार के उत्तम वृक्ष पर निवास कर रहे हम लोगों…
- Verse 14महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे महाबुद्धि पक्षिराज, कल्पान्त हेतु उत्पातवायुओं के, जो चन्द्रम…
- Verse 15भुशुण्ड ने कहा : भगवन्, जब सहस्र महायुगों के अन्त में जगत की अवस्था में व्यवहार गिर जाता…
- Verse 16(उस समय मैं) समस्त कल्पनाओं का परित्याग कर ओर निश्चल स्वभाववाले अंगों से (&) गरुडस्य जातम…
- Verse 17सामान्यतः कथित आकाश स्थिति का धारणा भो से विशेष उल्लेख करते हैं। महाराज वसिष्ठजी, प्रलय क…
- Verse 18जब प्रलयकाल में बड़े-बड़े पर्वतराजों को मर्दित कर देनेवाले प्रलयकालीन वायु बहते हैं, तब म…
- Verse 19जब प्रलयकाल में जगत, जिसमें मेरु आदि पर्वत गल जाते हैं, एक समुद्रस्वरूप हो जाता है, तब वा…
- Verses 20–21"उस प्रकार कितने समय तक तैरते रहते हो ?” इस शंका पर कहते हैं। महाराज, ब्रह्माण्ड के पार क…
- Verse 22महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे पक्षीन्द्र, प्रलयकाल में तत्-तत् धारणाओं के द्वारा अखण्डित…
- Verse 23इस विषय में तत्-तत् प्रबल प्रारब्ध का अनुसरण करनेवाली सत्यसंकल्प स्वरूपा ईश्वरनियति ही…
- Verse 24महाराज, जो अवश्य भवितव्यता है, उसका बुद्धि से 'इदम्-इत्थमेव” इस प्रकार अवधारण नहीं कर सक…
- Verse 25प्रत्येक कल्प में इस कल्पवृक्ष के निर्माण में भी भोगजनक अदृष्ट में हेतुभूत मेरा संकल्प ही…
- Verses 26–27महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तुम्हारी आयु मोक्ष के सदुश अत्यन्त अपरिच्छिन्न है, तुम सुद…
- Verse 28भुशुण्ड ने कहा : हे श्रेष्ठतर, इस पृथ्वी के विषय में मुझे स्मरण है कि एक समय इसमें शिला ओ…
- Verse 29मुझे भलीर्भोति स्मरण है कि मेरुपर्वत के नीचे यह पृथ्वी ग्यारह हजार वर्षो तक भस्म-सार के भ…
- Verse 30पहले मेरुपर्वत के नीचे पृथ्वी पर न सूर्य उत्पन्न हुआ था, न इसमें चन्द्र-मण्डल का भान ही ह…
- Verse 31सुमेरुपर्वत के रत्नों के तलप्रकाशों से इस पृथ्वी का आधा कोटर प्रकाशित होता था तथा इस पर क…
- Verse 32यहाँ बल, ऐश्वर्य आदि से परिपुष्ट असुरो का संग्राम होने पर जव इस पृथ्वी का भीतरी भाग क्षीण…
- Verse 33चार युगो तक मद-मत्त एेश्वर्यशाली असुरो के द्वारा आक्रान्त हुई यह पृथ्वी उनके (असुरो के) अ…
- Verse 34एक समय इस जगत- रूपी कुटिया में मेरु को छोडकर दूसरे सब देश समुद्र ने अंत तक आच्छादित कर दि…
- Verse 35दो युगो तक तो यह (पृथ्वी) जंगली वृक्षों से निबिड थी और इसमें उन्हे (वृक्षों को) छोड़ दूसर…
- Verse 36एक समय यह पृथ्वी चार युगो से अधिक काल तक निबिड पर्वतां से व्याप्त थी; उसमें मनुष्यो का सं…
- Verse 37दस हजार वर्षो तक तो यह मृत दैत्यों के अस्थिपर्वतों से चारों ओर से व्याप्त एवं परिपूर्ण थी…
- Verse 38एक समय अन्तरिक्ष आदि लोकों मेँ भय के कारण समस्त विमानगामी देवता आदि तिरोहित हो गये थे ओर…
- Verse 39महाराज, एक समय मेरु-स्पर्धा से विन्ध्यमहापर्वत के बढ़ने पर दक्षिण दिशा से अगस्त्य महामुनि…
- Verse 40ये ओर इनसे पृथक दूसरे भी बहुत वृत्तान्त हैं, जिनका मुझे संस्मरण है, परन्तु उनके विषय में…
- Verse 41हे ब्रह्मन्, सेकडों असंख्य मनु बीत गये, ये सब प्रभाव के आधिक्य से परिपूर्णं थे एवं सैकड़…
- Verse 42दूसरा आश्चर्य कहते हैं। एक समय यानी जब ब्रह्माण्डशरीर विराट् उत्पन्न होकर अपने स्वरूप का…
- Verse 43कलियुग की सृष्टि-स्थिति का स्मरण कर रहे पक्षिराज भुशुण्ड कहते हैं। एक समय एेसी उन्मत्त सृ…
- Verse 44आश्वयान्तिर कहते हैं। महाराज, मुझे किसी एक ऐसी सृष्टि का स्मरण है कि जिसमें यह भूपीठ वृक्…
- Verses 45–46जल में पृथिवी के निमग्न हो जाने पर जनलोक आदि प्रकाश प्रचुर लोकों के व्यवहारों से उपलक्षित…
- Verses 47–48महाराज, एक समय की सृष्टि में न इन्द्र था, न कोई राजा था, न उत्तम, मध्यम एवं अधम का भेद था…
- Verse 49उसके बाद चन्द्रमा और सूर्य का निर्माण हुआ | तदनन्तर इन्द्र एवं उपेन्द्र की व्यवस्था हुई ।…
- Verses 50–51बाद में देव, दानव, मनुष्य आदि प्रत्येक में राजाओं की कल्पना की गई । पश्चात् मत्स्यरूप ग्…
- Verse 52कल्पान्तर मे अपने द्वारा देखे गये अन्यान्य आश्चर्यो का कथन करते हुए तत्त्ववेत्ता भ्ुशुण्ड…