Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यथा तिष्ठसि पक्षीन्द्र धारणाभिरखण्डितः ।
कल्पान्तेषु तथा कस्मान्नान्ये तिष्ठन्ति योगिनः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने
कहा : हे पक्षीन्द्र, प्रलयकाल में तत्-तत् धारणाओं के द्वारा अखण्डित होकर जैसे तुम स्थित रहते हो,
वैसे दूसरे योगी क्योकर स्थित नहीं रहते, क्यों वे शरीर त्यागकर मुक्ति प्राप्त करते हैं ?