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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

यदा शकलिताद्रीन्द्रा वान्ति प्रलयवायवः । पार्वतीं धारणां बद्ध्वा खे तिष्ठाम्यचलं तदा ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

जब प्रलयकाल में बड़े-बड़े पर्वतराजों को मर्दित कर देनेवाले प्रलयकालीन वायु बहते हैं, तब मैं पर्वतसम्बन्धिनी धारणा बाँधकर आकाश-मण्डल में अचल होकर स्थित रहता हूँ (तात्पर्य यह है कि प्रलयकाल में पृथ्वी पर स्थित पर्वतो के विनाशी होने के कारण उन्हीं पर प्रलयकालीन वायुओं का आघात होता है, इसलिए प्रलयकालीन वायुओं से होनेवाले आघात के अविषय ब्रह्माण्ड के बहिर्भूत आकाश में साधारण वायु से भी क्षोभ न होने के लिए पर्वतसम्बन्धिनी धारणा बोधकर मैं स्थित रहता हूँ)