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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verses 20–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

ब्रह्माण्डपारमासाद्य तत्त्वान्ते विमले पदे । सुषुप्तावस्थया तावत्तिष्ठाम्यचलरूपया ॥ २० ॥ यावत्पुनः कमलजः सृष्टिकर्मणि तिष्ठति । तत्र प्रविश्य ब्रह्माण्डं तिष्ठामि विहगालये ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

"उस प्रकार कितने समय तक तैरते रहते हो ?” इस शंका पर कहते हैं। महाराज, ब्रह्माण्ड के पार को यानी स्थूल, सूक्ष्म और समष्टिरूप ब्रह्माण्ड के परम अवधिस्वरूप अव्याकृत को प्राप्त कर समस्त पदार्थों के अन्तभूत एवं निर्मल आत्मपद में निश्चलात्मक सुषुप्ति के सदृश एकरस निर्विकल्प समाधि-अवस्था से मैं तब तक स्थित रहता हूँ, जब तक कमलोद्भव ब्रह्मदेव पुनः अपने सृष्टिकर्म में प्रवृत्त नहीं होते । पुनः सृष्टिरूप व्यापार के होने पर ब्रह्माण्ड में प्रवेशकर इस कल्पवृक्ष के स्थानापन्न मैं अपने आलय में फिर स्थित हो जाता हूँ